क्या आपको यह पता है कि रावण की मृत्यु के बाद सूपर्णखा सीता से मिलने जंगल आई थी, ये हुआ था..!

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सीता ने सुपर्नखा को जब बेर दिया:

surpanakha met sita
सीता ने सूपर्णखा की सारी बातें शांतिपूर्वक सुनी और उसकी बात का बुरा ना मानते हुए हँसकर उसकी तरफ बेर देते हुए कहा कि, ‘यह बेर उतने ही मीठे हैं जीतने शबरी के बेर मीठे थे’। सूपर्णखा यह देखकर हैरान हो गयी कि, उसने सोचा था की सीता को दुखी करके वह सुख का अनुभव करेगी और यहाँ तो बिलकुल उल्टा हो रहा है, सीता स्थिर अवस्था में बैठकर मुस्कुराये जा रही है। यहाँ सीता ने अपने भाग्य को स्वीकार कर मुस्कुराना सिख लिया है। सूपर्णखा का दुःख देखकर सीता ने उससे कहा, “कब तक हम किसी और से उतने ही प्रेम की उम्मीद कर सकते हैं जितना हम उन्हें करते हैं। अपने अन्दर की शक्ति को खोजो दूसरों को प्रेम करने के लिए जब वह आपने प्रेम ना करता हो। खुद के भूख की परवाह किये बिना दूसरो को खिलाना सीखो।“

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सीता की बातें सुनकर सुपर्नखा और पागल हो गई, और बोली मुझे अपने अपमान का बदला चाहिए। सीता ने उसे बताया कि जो बात बीत गई है उसे दुहराने से कोई फायदा नहीं है, पहले ही सबको उसके कर्मो के हिसाब से फल मिल चुका है। सीता ने सूपर्णखा को कहा की जो हुआ उसे भूल जाओ और जीवन में आगे बढ़ो, जिसने उसको दुःख दिया है उनका दिमाग कभी नहीं बढ़ सकता है, लेकिन तुम तो अपने दिमाग का इस्तेमाल कर सकती हो। सीता ने उसे बताया की वह अपने ही जाल में फसती जा रही है अगर ऐसा ही रहा तो वह भी रावण की तरह बन जाएगी। सीता ने कहा संस्कृतियाँ आती हैं और चली जाती है, राम आते हैं और चले जाते हैं पर प्रकृति सदैव रहती है, इसका आनंद लो।